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हम अपनी खुशियों का पता अनजाने ही सबको दे देते हैं

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हम अपनी खुशियों का पता अनजाने ही सबको दे देते हैं... पर अपने जख्मों को हाथ लगाने की हां बस कुछ एक को। कभी कभी बस एक को । कभी कभी उस एक को भी नहीं। जिस रोज़ किसी को कुछ नहीं देते बस उसी रोज हम असल में खुश होते हैं । वो पता किसी को भी नहीं पता होता। वो पल हम ईश होते हैं ईश्वर के ईश
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें