भाषा / Language
मन है कि कहीं साथ बैठकर किसी बांस को रोज़ बढ़ते हुए देखूँ ।
✦
मन है कि कहीं साथ बैठकर किसी बांस को रोज़ बढ़ते हुए देखूँ ।
संग बैठ कर देखूँ कि आसमान का आज कौन सा तारा छिटक कर तुम्हारे तिल को रोशन कर रहा।
तुम्हारे साथ बैठूं तो गिनती रहूँ कि कितनी बार तुमने आसमान को देख कर खुदा को शुकराना कहा।
इस फेर साथ बैठेंगे तो रेत घड़ी गिरा कर आढ़ी कर दूंगी।
न वक़्त इधर आएगा न उधर जाने दूँगी।
😊
*लिखा हुआ पुराना है।
तस्वीर आज ली है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें