कल्पनाशब्दों के बीच
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विदा

विदा ..... दो मनके हैं तुम को दे दिए हैं। गंगा जी के साथ वो बीती शाम याद करती हूं तो लगता है बह रही नदी से सुंदर क्या ही बनाया होगा ईश्वर ने। एक रोज़ सब बह जाते हैं। मैं भी बह गई "उस रोज़"। ईश्वर ने मुझे सुंदर होने का पल दिया होगा शायद। नदी होना सबके बस का होना ही चाहिए। पल दो पल सही ।एक बार के लिए ही सही। अच्छा नहीं होता बंजर होना या कर देना। लौटना .... लौटाना । नदी में पैर डाले बीती शाम याद में बनी रहे। दो सखियों के स्पर्श को तुम क्या जानोगे समुंदर । मन की कह आई हूं ।रौशनी में नहा आई हूं। प्रेम पत्थर ...दीपक फूल पात संग यात्रा पर भेज दिया है। जहां डूबे तुम तार देना। वो शाम जो रात पर भर भर गिरती रही । बिंध गई है मुझमें । *ऋषिकेश में दो सखियों कैद हैं ।जो देख सके देख ले।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें