कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 3615

भाषा / Language

शून्य में शून्य देखना कभी

शून्य में शून्य देखना कभी.... मैं देखती हूं तो मुझे ढेर सारा तुम्हारा प्रेम दिखता है। मेरे एकांत में दो शून्य अक्सर इतराते फिरते हैं। मैं जानती हूं... एक रोज़ गश खाकर गिरेंगे। धूल झाड़ेंगे। फिर एक बार पूछेंगे... इस बार तेरे शहर का नाम क्या है इश्क ? शुभ रात अच्छे रहना तुम।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें