भाषा / Language
दुःख ये नहीं कि मैंने एक रोज़ अपना अंधेरा तुम को दिखाया।
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दुःख ये नहीं कि मैंने एक रोज़ अपना अंधेरा तुम को दिखाया।
दुःख ये रहा कि मैंने अपना खालिस अंधेरा उदासी में मिला दिया।
बेहद उदास दरख़्त को मैंने अपने अंधेरा सौंपा और खोह हो गई।
मुझे अभिमान था खुद पर ...
अब संशय है।
मुझे दुःख है अपनी उस बदसूरती का जो मैं छिपा नहीं पाई ।मन का एक नम कोना अब मेरी मजार है।
मैं अपने मरे पर रो भी नहीं सकती कि मुझे मुझमें मेरे ही खोने का प्रमाण पत्र कौन देगा।
इससे ज्यादा बेवजह कौन होगा ?
कहो तो?
ईश्वर के आगे फूल ही रखने चाहिए थे।
प्रेम फूल
देह फूल
कागज़ हो गए।
तुम ना जाने किस जहां के हो गए।
* तस्वीर मुझे पसंद है।
और ऊपर लिखे मनके मेरे पसंदीदा।
नोट्स में कहीं दबे मिले। जाने कौनसी कहानी को पढ़कर लिखा होगा। जाने किस उदास दरख़्त को थोपा होगा मन
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें