भाषा / Language
एक धुआं चुना एक रोज़
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*एक धुआं चुना एक रोज़
वही जला रोज़ रोज़
जो पाया नहीं उसे पाने की ज़िद्द ही प्रेम है।
*आपके पास मेरे लिए प्रेम है ही नहीं
तो आप क्या दे सकेंगे।
ये मेरा दुःख है।
पर मेरे पास अकूत है
बस आप ही के लिए ।
ये मेरा सुख है।
*प्रेम को विराम नहीं अर्धविराम ज्यादा मार देता है।
आपने तो थामा ही नहीं ।
बिछड़ने छोड़ने के दुःख तो मेरे हिस्से आए नहीं।
ये क्या कम प्रेम है कि आप मुस्कुराते रहे...मेरी नादानियों पर
*आपने मोह का धागा न तोड़ा
ना गिरह लगाई
मैं रेशम रही ...
बिना इजाजत बिना तिजारत
खुद में
शुक्रिया इसी बात का।
*हर ना हां भी नहीं होती
हर ना पूरी हां भी नहीं।
ये अजीब भ्रम है।
मुझे इस भ्रम में प्रेम दिखा
और इसी में प्रेमी तुम दिखे।
सब कुछ मिला मिला सा लगता है
पाए बिना भी।
*आपको जाने देते हैं हर बार
ये सोच कर कि आवाज नहीं देंगे
पर खुद को चाहने से बाज़ नहीं आते
आप को आप ही रखेंगे ताउम्र।
छोर के उसपार आप न सही
आपका न होना सही।
*अपना नाम लिखती हूं तो आपका नजर आता है
आपका मिटाती हूं तो खुद का लिखा पाती हूं।
ये मेरी रोज़ की कविता है।
रोज़ को पल पल पढ़ लो ना
इतना तो कर ही दो
निर्मोही
आप
आज छुट्टी है ।मनमर्जियां बिखरी रहें आसपास तो सुकून रहता है। जो जी आए लिख रही।
आफरीन मन है आज।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें