भाषा / Language
अब इतनी सी बात समझ आती है कि
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अब इतनी सी बात समझ आती है कि...
किसी तस्वीर में जिस्म की खुशबू नहीं आती ...
कोई लिखी कविता पलक नहीं झपका सकती।
कोई कहानी मृत्यु रोक नहीं सकती।
कोई संवाद ईश्वर के चाहे बिना हो नहीं सकता।
कोई आलेख रोटी पानी का हिसाब नहीं दे सकता।
किसी हस्ताक्षर से आप गिन नहीं सकते उसके उठाए सुख दुःख ।
मौलिक कुछ भी नहीं।
किताब को कभी कहां मिला चुनने का अधिकार
उसे मिली छाप
एक उतरन आवरण के नाम पर
एक नाम सुझाया हुआ
प्रेमी यदा कदा से
और मिली अनंत उदासी
हो जाने के बाद कुछ नहीं होने वाली
खुदी लिखी जाए खुद में।
जिंदा किताब
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें