भाषा / Language
मेरी उदासी का ठौर भी प्रेम ही है।
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मेरी उदासी का ठौर भी प्रेम ही है।
खुरच कर देखी हृदयलिपि
उस पर तुम्हारा शहर मिला ।
तुम मिले।
और मेरी मौन पदचाप मिली।
* एक रोज़ इसी उदासी में मैं तुम्हें अपनी आत्मा के भीतर झांकने का मौका दूँगी....
तुम सब कुछ देखना
फिर मुझे चुनना
मैं सौ अपराध और करूँगी
तुम मुझे बचा ले जाना।
😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें