भाषा / Language
जो खत्म हो जाए वो प्रेम हो सकता है क्या
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जो खत्म हो जाए वो प्रेम हो सकता है क्या ?
रुचि बहुगुणा उनियाल ने पूछा।
मन में ये ख्याल आया...
आपको दीवानगी की हद तक पसंद किया है।
आपके दोष
आपके सारे minus के साथ
मैं कैसे कहूं आप बुरे हैं जब आपने मुझे हर कदम पर सही रखा । मुझे गलत होने से बचाया। मुझे नहीं दिखने दिए अपने दोष। आप उज्जवल रहे । हमेशा पाकीजा मेरे लिए। आप दूसरों के साथ क्या हैं ...इससे क्यूं बदल जाए मेरा नजरिया।
मैं दूसरों की निगाह से आपको क्यों देखूं जब मेरी आंखों ने चुना है तुमको दुनिया देख कर।
आप यूं ही बने रहिए।
अच्छे या बुरे
दुनिया के लिए।
मेरे लिए बस ईश्वर के बाद का पायदान बनकर।
मैं ऐसे प्रेम में पड़ गई हूं।
तू बता ये खत्म होना है या नहीं?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें