भाषा / Language
प्रेम अगर दोस्ती की पंखुड़ियों से ढंका हुआ हो तो एक दिन गुला…
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प्रेम अगर दोस्ती की पंखुड़ियों से ढंका हुआ हो तो एक दिन गुलाब हो जाता है।
अपने भीतर इतना ही तो रखना था मुझे कि मैं रोज़ नई कविता रच सकूँ ....
तुमने तो मूक कर दिया।
सुनो!
रख नहीं पाए या ....
परख नहीं पाए?
Benefit of doubt अब भी तुमको ही देती हूँ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें