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इतना खर्चे जाने पर भी मैं खुद में बाक़ी हूँ

इतना खर्चे जाने पर भी मैं खुद में बाक़ी हूँ.... उस बाक़ी को लिख देती हूँ शायद तुमको लिखना मेरी लत है। एक समंदर .....पिछले पन्नों पर एक आकाश .....अभी मेरे अंदर इस पन्ने पर और एक रेगिस्तान..... आगे के सभी पन्नों पर बचा रहता है "अनहद " तुम सदा रहना। *कुछ दिनों से मन मर गया है । खुद में एक खनक की कमी है। लग रहा घुप्प किसी खोह में घुस जाऊं। क्या खो दिया ? क्या क्या पाना बाकी रहा इसका हिसाब करूं। जी भर गुम हो जाऊं कुछ रोज़ तक। कुछ अंदर ही अंदर दुख रहा। उसे सहलाने की जरूरत है । खुद से मिलकर आती हूं। आप सब ख्याल रखें । जीवन सुंदर है । दुःख सबके हैं। हमेशा रहेंगे। मन दरियादिल रहे। मरता मिटता रहे। आती हूं। Fb विराम शुभ दिन।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें