कल्पनाशब्दों के बीच
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ये बेहद बाद में समझ आया है कि फिजूल और बेवजह में भारी अंतर…

ये बेहद बाद में समझ आया है कि फिजूल और बेवजह में भारी अंतर है । आप कितने भी हुनरबाज हों इन दो शब्दों का गच्चा एक रोज खाते ही खाते हो। जब तक चाहे बिछते रहो लोग कुछ नहीं कहेंगे ... पर जिस दिन मन होगा तुम पर चल देंगे ... तुम इसे प्रेम समझोगे... धीरे धीरे उपेक्षा रिसती नजर आएगी। उस रोज कराह खुद को सुनाई देगी सिर्फ और सिर्फ तुम मसले जाओगे। जाया हो जाना इसे कहते हैं । भुगतो कुछ देर और मन गुब्बारा हो जाने तक फुस्स या फटाक हो जाने तक शुभरात
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें