कल्पनाशब्दों के बीच
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तुम जहां कहीं हो

तुम जहां कहीं हो मैं ठीक उसी राह में कहीं बैठ गई हूं। यहीं मिलूंगी। तुम्हारी प्रतीक्षा मेरे आसपास से रोज गुजरती है। मेरी मुस्कान देख कर चौंकती है । फिर मेरा माथा चूम कर कहती है आएगा आएगा आएगा..... आएगा आने वाला आएगा। *पहाड़ी सीढ़ी पर प्रतीक्षा बैठी है। मैं तो गीत गुनगुना रही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें