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एकांत

एकांत..... उसे शौक था अकेलेपन को यूँ सँवारने का । वो इश्क़ में थी अपने एकांत से। अपने को बचाये रखने के लिए वो छुपा लेती थी खुद को जाने कहाँ कहाँ। वो अक्सर मिलती थी उंगलियों में जो उसकी गिटार को बेहद पसंद थी। और उस खिड़की पर भी जहां सीप वाला विंड चाइम उसका रोज़ इंतज़ार करता था। उस दीवार पर जहां एक बड़ा सा आईना उसे रोज़ love u too लिखा दिखाता था। उसे पसंद था खोए रहना ....उस मोरपंख के साथ जो उसकी पसंदीदा पंक्तियों से लिपटा हुआ मिलता था। उसे एक शौक ये भी था कि उसने अपना अकेलापन प्लेलिस्ट पर सहेज कर रख लिया था और जब चाहे उसे अपनी हस्कीआवाज़ में गुनगुनाया करती थी। ज्यादा अकेली होती तो रंग हो जाया करती थी अपनी छोटी सी बालकनी में लगे पौंधों पर । फूल से ज्यादा उसे पत्ते हो जाना भाता था । दो ही रंगों में उसे अपना अकेलापन खूबसूरत लगता था असमानी नीला और गहरा हरा। उसे बहुत भाता था अपनी हथेलियों को भर लेना ...अलग अलग जायकों ,रंगों और छुअन से। उसकी फ़ोन गैलरी भरी पड़ी थी ऐसी ही खूबसूरत हथेलियों से । सिरहाने में छोटे छोटे अदृश्य फूलों के गुंचे सिर्फ उसे ही दिखते थे। ये वे बहुत सारी बातें थी वो जो खुद से कहती थी और वहीं दबा देती थी। उसकी ओर कौन कितना आएगा इसका फ़ैसला वो रोज़ खुद करती थी । हद और दायरे उसके होते। ज़्यादा ही अकेली होती तो बुला लेती इशारे से खिड़की पर टंगे उस चाँद को और फ़ोन पर saved doc से कॉपी पेस्ट कर देती उस पर तमाम प्रेम कविताएं । अकेलापन गुलज़ार रहे उसका । वो सबसे ज्यादा ज़्यादा जीती है वहां। ज़िन्दगी से भी ज्यादा। और बेहद खूबसूरत हो जाती है। यकीन मानिए निचले होंठ के ठीक नीचे beauty spot नहीं उसने अकेलापन ही इकट्ठा रख रखा है। कोई सुन सके ....तो सुने ..... उसका एकांत उसमें एक शोर है। *तस्वीर में भव्या है ।मेलबर्न का समंदर है। पर एकांत मेरा है ....तुम्हारी खुशबू लिए। शुभरात ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें