कल्पनाशब्दों के बीच
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आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया

आपने याद दिलाया तो मुझे याद आया .... @कल्पना लाइव मेरे लिए आसमान में एक कदम बस झूम कर रखने की कोशिश भर थी। अपने ही मन को मैंने लेप दिया हो जैसे । अपना सर अपने ही सामने झुका कर रख दिया हो जैसे और खुद ही मुस्कुराते हुए उठा कर जी भर देर तक निहारा।खुद को तिनका तिनका बिखेरा और खुद समेट कर वेणी बना कर सजा ली। कुछ रोज़ पहले डॉ आदर्श प्रकाश जी को अपनी किताब भेजी थी। आज उन्होंने बेहद प्यार से मेरी किताब को अपने शब्दों में ढाला है। आपका दिल से आभार। कल्पना के लिखे को समय देने के लिए। अपना मन देने के लिए। आपके भेजे शब्द सांझा कर रही। समीक्षा - जो नहीं कहते , वही शब्द सबसे ज्यादा पहुँचते हैं ........ (कल्पना लाइव , काव्य - कल्पना पांडेय ) कल्पना लाइव , कल्पना पांडेय का पहला -पहला प्यार है , कविता संग्रह रूप में । लेकिन इससे बहुत पहले कल्पना की नन्हीं -नन्हीं टिप्पणीनुमा कविताएँ , बरबस मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर चुकीं थी, यहाँ तक कि मैंने इन कविताओं की चर्चा रुचि उनियाल से भी की । रुचि ने ही मुझे बतलाया कि उसने कल्पना का नाम ही जादूगरनी रखा हुआ है । मुझे ऐसी प्रतिभावान कवियत्री को अपना फ़ेसबुक मित्र बनाने में देर न लगी । यह रोज़ का क्रम हो चला है कि उसकी लिखी दो -तीन रचनाएँ नियमित रूप से पढ़ने को मिल जाती हैं , यानी कल्पना हमारी आदत बन चुकी है । याद आया किसी की रचना है - प्यार में बेबसी नहीं जाती / ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती एक आदत सी बन गई हो तुम / और आदत कभी नहीं जाती । कल्पना की काव्य शैली उसकी मौलिक शैली है , इतनी मौलिक कि यदि उसकी चंद कविताएँ , बिना उसका नाम बताए , आप कहीं डाल दें तो पाठक तुरंत बता सकता है कि यह कल्पना पांडेय की कृतियाँ हैं । मुझे यह किताब बहुत पहले मिल गई थी , लेकिन इन कविताओं पर मैं मुझसे चलताऊ ढंग से बात न करना चाहता था , न ऐसा मुझ से हो सकता था । मैंने पहले न भूमिका पढ़ी , न ही कल्पना स्वयम् अपनी कविताओं के संबंध में क्या कहती है , यह पढ़ा । मैं सीधा कविताओं में जा उतरा , और उस स्त्री से मिला , जो सबसे पहले स्वयम् का यथार्थ न केवल समझती है , बल्कि निरंतर उसका सामना करती है । वह प्रेम में पूरे होशो - हवास में डूबती -उतरती है , अपने ही निराले अंदाज में - “ काश …. तू हिरन , मैं कस्तूरी होती / तुझ में क़ैद रहती , हमेशा समाये रहती / अपनी ख़ुश्बू से तुझे सराबोर रखती / वजह मैं होती , पर दुनिया तेरी दीवानी होती ।” यह कल्पना ही है जो यहाँ तक महसूसती है कि , “ अहसास ….” बालू “ हुए जा रहे हैं / मसरूफ हथेलियाँ ….पर बीच रुकते ही नहीं। “ ऐसे फिसलते अहसासों को शब्द दे पाना , और इसके बावजूद भीतर उस दौड़ की टापों को सुनना , कि “ दिन के बाद रात के पीछे भाग रही है ज़िंदगी / ख़्वाबों के ख़ातिर बस जाग रही है ज़िंदगी । “ कल्पना के कुछ अनुभव जन्य निष्कर्ष हैं , जिनका यथार्थ अप्रिय होते हुए भी , कड़वाहट न बन कर मंत्र बन जाता है - “ ज़्यादातर लोग सादगी मुड़कर देखते नहीं / पर अद्भुत को अक्सर रुक कर सुनते हैं ।” “ जो नहीं कहते , वहीं शब्द सबसे ज़्यादा पहुँचते हैं “ , …., “ कि जो सहज है वहीं सबसे कठिन है ।” , कुछ अपने से ऐसे सवाल , कि “ साँस एक तरफ़ा कब तक ज़िंदा रखेगी ? “ या यह कि “ हम तो शब्द बोते हैं तो …..ये प्रेम कैसे फूट रहा है ? “ या ऐसा अनुभव कि , “ आज फिर ….ख़्वाहिशों का धुआँ उठा / कच्चे से मन के पक्के से चूल्हे पर ।” “ अद्भुत देखा नहीं ….बस छुआ जा सकता है ।” कल्पना का ग़ज़ब का आत्मविश्वास अपनी भीतरी पहचान से अर्जित हुआ है , तभी वह कह पाती है - “ मैं अपनी थाप की मालकिन हूँ / और अपनी ऊष्मा की भी / इन्हें कभी सुरमें में / कभी महावर में भर लेती हूँ / मेरी मुस्कान कराहती है / मेरे दुख महकते हैं / अद्भुत दिखा क्या ?” कल्पना का समर्पित गहन प्रेम उसकी रचनाओं का स्थाई भाव है । “ इन पहाड़ी रातों को फोड़ोगे / कई सोते रेतीले धोरे / और कई जागे समंदर / गलबहियां डाले मिलेंगे / निर्लज्ज से / और सिर्फ़ तीन शब्दों की धड़क / ओ रे पिया …/ ओ रे पिया …करता हुआ / सांय सांय जंगल ।” निगोड़े बादल , कविता में भी - “ कल्पना - कल्पना वाली / टिप -टिप पिरो रहा हो / ऐसे की बस / ये रूमानी मंजर / सिर्फ़ मेरे लिए गढ़ रहा हो ।” यह प्रेमिल अहसास अपने आप में सम्पूर्ण है , कि “ जब भी मन उदास होता है / तुम झर -झर / गिरने लगते हो आस -पास ।” अभी , मेरे ,उसकी एक कविता पर उठाए सवाल पर कल्पना ने लिखा , “ सर ! आपको प्रश्नों के बारे में मैं क्यूं और क्या बता सकती हूँ ? मैं तो जलेबी पकाती हूँ । आप ख़ुद दो पल स्त्री हो कर देख लीजिए । अगर अदृश्य प्रश्न चिपके हुए मिले तो कविता सार्थक , नहीं तो…. कूड़ा । “ कल्पना की दावानल कविता में ऐसी ही सच्चाई , मेरे सवाल का जवाब बनी दिखी - “ तुम आज काग़ज़ पर शब्दों -सी प्रखर हो / रूमानी अग्नि सी ….बेहद ठोस / स्त्री तुम लिखने लगीं / तभी चुभने भी लगीं / यलगार हो …….”। ऐसी स्त्री का लिखना यदि चुभने लगे तो यक़ीन मानिए वह लम्बी दौड़ की पूरी तैयारी में है ।उसकी यह दौड़ उसकी अपनी ही शर्तों पर होगी , अपने ही अंदाज में होगी , इस भरोसे के साथ कि वह पाठक को समृद्ध करेगी । डॉ आदर्श 25M.I.G हाउसिंग कॉलोनी उधमपुर (जम्मू -कश्मीर ) 182101 मोब -9149504226 *तस्वीरें बस अभी ली हैं। @कल्पना लाइव
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें