कल्पनाशब्दों के बीच
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जो दिखती हूं वो हूं ही कहां

जो दिखती हूं वो हूं ही कहां.... हो सकता है जो पत्तियां तुम शाख पर ढूंढ रहे वो मेरी जड़ों में दबी हो। दिख जाने में हुनर नहीं काबिले तारीफ़ अयारी है मेरी ठीक जैसी मेरी लेखनी *शाम गजलों में डूबी है । रसोई में खाना पका रही । Ahmed Hussain ji Muhammad Hussain ji आप साथ हैं। आपको दुआ लगे।दिल में आवाज़ का जादू जगा रहे। संग संग मुस्कुरा रही। क्यों? सुनकर देखिए ये जादू.... दो जवां दिलों का गम दूरियां समझती हैं कौन याद करता है हिचकियां समझती हैं। तुम तो खुद ही कातिल हो तुम ये बात क्या जानो... क्यों हुआ मैं दीवाना बेड़ियां समझती हैं। लव यू हमेशा रहेगा! तस्वीरें आज शाम कैद की हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें