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अल्मोड़ा पहुंचने से थोड़ा पहले एक जगह आती है..… सुयालबाड़ी।

अल्मोड़ा पहुंचने से थोड़ा पहले एक जगह आती है..… सुयालबाड़ी। आप इसे मेरा पहाड़ी शॉपिंग सेंटर कह सकते हो। पहाड़ को जाते आते यहां जरूर रुकते हैं। कुछ छोटी छोटी दुकानें हैं यहां। इन्हीं में एक किराने की दुकान भी है । शहर दिल्ली की चमकीली कोई ढब इधर नहीं दिखती। बेहद बेतरतीब ..फैली फैली । सामान बस रखा हुआ लगता है। बेहद सादी। पर बेहद मशहूर है। वजह है यहां मिलने वाला खाने पीने का पहाड़ी सामान। कितने ही प्रकार के राजमा,पहाड़ी दालें,सोयाबीन,भट्ट, भांग, जंबू,गंधरेनी,तिल,लाल चावल, घोत की डाल,गुड, शहद और भी जाने क्या क्या । सारा कुछ दूर दूर गांव में उगाया जाने वाला।पहाड़ जाओ तो बस पहाड़ी खाना खाने में ही आनंद है। भट्ट के डूबके,जौला, कापा भात,रस भात,झोली,भांग की चटनी, बडी भात और भी जाने क्या क्या। आधे नाम तो मुझे पता ही नहीं। इसी दुकान से एक झोला पूरा भर के ले जाती हूं। बाहर से पहाड़ी ताजी सब्जियां और फल भी सजे रहते हैं...पहाड़ी मूली, गडेरी,पिण्यालु,पहाड़ी आलू,अदरक, बड़ा बड़ा लहसन,लाई,पहाड़ी, पालक,मेथी, गेंठी, माल्टा,पहाड़ी नींबू,,धनिया,मिर्च देख कर ही लगता है ....अहा कहां आ गये हम। दुकान वाले दाज्यु की बात बताती हूं। मैंने कहा आपके यहां पहाड़ी और क्या अच्छा है? ये अखरोट ले जाइए। आसानी से टूटते हैं...वे बोले। मैंने कहा सच्ची कहना। दांत और दरवाज़े तो न टूटेंगे। ठग मत लेना। वो हंस कर बोले....परदेसियों को क्या ठगना? मैंने कहा...परदेसी कैसे ?हम तो भाग भाग कर अपने घर को आते रहते हैं। हमको प्यारे हैं पहाड़। उन्होंने इस बीच करीब दस बारह अखरोट तोड़ कर विनोद ,दक्ष और मुझे खिला दिए। बोले....गाड़ी में बुबू बैठे हैं ना? मैंने कहा .... हां पिताजी हैं ।मेरे ससुर जी। दाज्यू बोले.... बुबू पहाड़ी हैं । देखो इस उमर तक लौट रहे। तुम भी इसी उम्र तक लौटती रहोगी तो बात है। मुझे उनकी बात का मर्म समझ आ गया।मैं मुस्कुरा दी। मतलब बुढ़िया होने तक तुम्हारे ही दुकान से सामान लेना होगा फिर तो...मैंने कहा। वो हंस पड़े ...एक किलो अखरोट में दस बारह अखरोट फालतू डालते हुए बोले.... और क्या। आते रहना। हम तुम से ही तो पहाड़ हैं। करीब ग्यारह सौ बीस रुपए की शॉपिंग के बाद मैंने कहा अब बीस रुपए क्या ले रहे। डिस्काउंट तो बनता है। वो बोले...ना दीदी हिसाब तो हिसाब है। ****मन ही मन सोचा जो बीस पच्चीस अखरोट का हिसाब नहीं रखता वो बीस रुपए का हिसाब खरा रख रहा। ये सादगी ये पहाड़ी मन कहां मिलेगा। ऐसे सब क्यों नहीं हो जाते? ये अखरोट वही हैं...अनमोल चख लो। पहाड़ी लोग...पहाड़ी बातें शुभ दिन
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें