भाषा / Language
रंग से रंग निकाल देने से बेरंग नहीं होती तस्वीर ।
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रंग से रंग निकाल देने से बेरंग नहीं होती तस्वीर ।
बेरंग में रंग नहीं छिड़क पाने की असमर्थता से रंग बेरंग रह जाते हैं।
ठीक इसी तरह अगर तुम प्रेम को प्रेम से निकालोगे तो प्रेम रंग न उड़ाएगा। वो और मदमस्त और बागी हो जायेगा।
तुम समझते क्यों नहीं....प्रेम को प्रेम देकर ही शांत किया जा सकता है। कैनवास पर बिंदु बनाकर रखा जा सकता है और लकीर भी।
बेरंग को tame किया जा सकता है बिना रंग बिना कूची के।
एक ये भी बात अंतस में उभरती है कि....
आप किसी का सुख सोखने की कोशिश में अपने लिए दुःख ही जमा कर पाओगे।
कोई भी सुख सोखने दुहने से तीता दुख ही निकलता है....
चाहे वह प्रेम ही क्यों न हो।
मेरा तो यही सच है।
कहना तो ये भी था...
तुमसे इतनी हताश हो चुकी हूं कि तुमसे आती हर उदासी से अब ऊब होती है.....
किसी रोज मिल गए तो चूम चूम कर हिसाब चुकता करूंगी
हर हताशा का
हर उदासी का
तुमको स्पर्श से खुरच दूंगी
आंसुओं से भर दूंगी हर खरोंच।
तुमको कुछ नहीं होना ही होगा मेरे लिए... उस रोज़
*रोज़ मुहब्बत पढ़ता है ये गंवार मन
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें