भाषा / Language
सुबह की पोस्ट में एक गीत सांझा किया था...ये उसी के बोल हैं।
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सुबह की पोस्ट में एक गीत सांझा किया था...ये उसी के बोल हैं।
जाने तेरे शहर का क्या इरादा है...
आसमान कम, परिंदे ज्यादा हैं
ओ जाने तेरे शहर का क्या इरादा है
ख़ुशी का हिस्सा
ग़म का हिस्सा
घूँट का हिस्सा
दम का हिस्सा
ज़ख्म और मरहम का हिस्सा दिल फ़रोशी का ये क़िस्सा जाने तेरा इश्क़ भी क्या तमाशा है
रात को मुल्ज़िम, दिन में ख़ुदा सा है
जाने तेरे शहर का क्या इरादा है
जाने हम पे कौन सी ऐसी तोहमत है
समझ ना पाएं ऐब है या ये आदत है
मलमल में लिपटे हैं
फिर भी बिखरे हैं
बस ये जाम हमारा है,
हम इसके हैं
यूँ तो मेरा दर्द ही इक दवा सा है
यूँ तो मेरा दर्द ही इक दवा सा है
हर घड़ी जिंदा
हर दिन नया सा है
जाने तेरे शहर का क्या इरादा है
*गीत के बोल बह जाने वाले थे तो घंटों तक बहती रही। शायद पूरे सफ़र में।
इतने में कहीं से शब्दों के परिंदे चले आए...कहीं दूर से किसी ने आवाज देकर कहा....
कल्पना मैं देखता हूं आपके साथ एक उदासी हमेशा चलती रहती है। ये गीत सुना।
गीत में डूबी हुई थी तो पढ़कर स्नेह उभर आया। मन ने कहा दुआ लगे इस आवाज़ को।
पलट कर जो जवाब दिए वो ये हैं...
आप और मैं जैसे लोग उदास होते नहीं...
उदासी रचते हैं
कि लोगों को प्रेम दिखा सकें।
महसूस करा सकें कि दुखना ....बहुत सारा दुखना ही प्रेम है।
इसी उदासी में प्रेम शाद रहता है
आबाद रहता है।
वो आवाज़ फिर गूंजी...
उदासी रचते है , ये कितनी खूबसूरत बात है तुम्हारी।
तुम ...... पूर्णांक है , प्रेम कविता का 😊तो आप जिस मन से उकेरती हो , वो मेरा सा है , इसलिए आपको खूब स्नेह।
मैंने भी अपनी आवाज लौटाते हुए कहा....एक गीत ने कितना प्यारा संवाद रच दिया है।
उदासी अगर प्रेम से महसूस की जाए तो प्रेम का पूरक ही है।
उदासी प्रेम के बिना... प्रेम उदासी के बिना *करीब करीब सिंगल *जैसे हैं।
अब मुझे फिर इरफ़ान याद आ गए।उनसे गले लग कर उदासी सेलिब्रेट करती हूं।
शुभरात
तुमको।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें