कल्पनाशब्दों के बीच
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आज "तन्हाई" मिल गयी बाज़ार में

आज "तन्हाई" मिल गयी बाज़ार में कुछ खरीद रही थी शायद मैंने पूछा ....आज बड़े दिनों बाद दिखी क्या खरीद रही हो ? मुस्कुराती हुई बोली बेज़ार हो गयी हूँ खुद से कुछ नया चाहती हूँ इक "कलम " कुछ "कागज़ "खरीदे हैं मेरी काली "स्याही "तो है ही अच्छा हुआ तुम मिल गयी कुछ लिखना चाहती हूँ कहते हुए गले लग गयी मैं भी ख़ुशी ख़ुशी उसके दिल में बस गयी ..... "तन्हाई "की "कल्पना "बन गयी। *तुम खोये नहीं हो.... मुझे मिले ही नहीं अब तलक
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें