कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 3355

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पल पल दिल के पास तुम रहती हो

पल पल दिल के पास तुम रहती हो... तुम मेरी छांव में बैठी हो.... मुझसे बातें कर रही हो.... पर दूर उस ठूंठ को कबसे कितने प्यार से घूर रही हो.....बहार से लदे दरख़्त ने लड़की से पूछा क्या तुम मुझसे खुश नहीं ? क्या तलाशती हैं तुम्हारी आंखें ? जो मांगोगी दे सकता हूं। सब कुछ तो है मेरे पास कहो तो... लड़की ने दरख़्त को बिना देखे उसी ठूंठ को देखते हुए कहा.... उस की उदासी लाकर दे सकते हो? जिसकी प्रतीक्षा में वो रुका हुआ उसका पता दे सकते हो? उसकी चुप्पी ..उसकी बेबसी दे सकते हो ? इक अरसे से आस लगाए बैठा है वो किसी के लिए।मुझे बस वो चेहरा बना सकते हो? उसका अधूरापन... उसकी प्यास कितने साल पुरानी है गिना सकते हो? मुझे उसमें इक पत्ती का इंतजार है ..उगा सकते हो? जो रिक्तता है उसके पास वही चाहिए मुझे...दे सकते हो? हैरान दरख़्त लड़की को एकटक देखता रहा। उसे लगा लड़की उससे छूट रही। वो जा रही है। लड़की कहती रही.... मेरा मन है कि उस दरख़्त से लिपट कर कहूं मेरे स्पर्श से फूट जाओ । बांट लो मुझसे ये बांझपन.... मेरा बस चले तो दौड़ कर अपने आंचल से उसे ढंक दूं और उसके पास जाकर कह दूं कि अब तुमको प्रेम पाश मिला है ।पहली पत्ती मेरे नाम की मेरे केश में टांगना तुम पर इक ही पत्ती की बाहर आए। मेरे लिए तुम इतने भर काफ़ी हो। बहार से लदे दरख़्त को लगा कि वो नमी में धंसा जा रहा है। लड़की शायद जाते जाते अपने आंसू उसकी जड़ों में छोड़ गई। बरसों बीत गए। उस ठूंठ पर वो पत्ती कभी नहीं आई। पर एक नाम उसके तने पर उभर आया... कल्पना।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें