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जिंदगी इसलिए नहीं डूबती कि आसपास दुःख हैं।

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जिंदगी इसलिए नहीं डूबती कि आसपास दुःख हैं। इसलिए बैठ जाती है कि हम दुखी हो जाते हैं... भर जाते हैं। याद कीजिए उस नाव को ...पानी भर जाए तो डूबती है।और पानी पर ही तैरती है। बस अंदर बाहर का अंतर है। उलीचते रहिए। पानी तो भरेगा ही । दुःख सा जो है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें