कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 3283

भाषा / Language

अपने "माज़ी "के चिपके पन्नों

अपने "माज़ी "के चिपके पन्नों को पलट कर देखो । फूंक मारो ..... कुछ है .... अब तक जिला कर देखो उस मुड़े पन्ने के नीचे तुम्हारी "मुहब्बत "है । अगर सोई है तो .....उठा कर देखो उठी है तो ......सहला कर देखो । एक बार फिर इश्क करके देखो ..... आज उन पन्नों को उड़ा कर देखो "माज़ी " से नया वाला दिल लगा कर देखो।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें