कल्पनाशब्दों के बीच
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सदाबहार खामोशियों के दरख़्त से कविता झड़ती रहती है.....हर मौसम

*सदाबहार खामोशियों के दरख़्त से कविता झड़ती रहती है.....हर मौसम *तुम्हारी रिक्तता लिखी नहीं जा सकती .... वो बस है मुझमें सदाबहार *दरारों से ज़िन्दगी उठा कर देखी है कभी? मैं रोज़ अपना प्रेम उठा कर दुआ में रख रही हूँ.... बरसों से *तुम्हारा नाम कुछ भी हो .... मैं तुम्हें साया ही कहूँगी। तुम मुझे अकेला होने कब देते हो? *मैं पिछले पन्ने याद नहीं रखती आगे आने वालों का हिसाब नहीं रखती ..... तुम मेरे लिए हमेशा "अब" हो। *चलोगे मेरे साथ ? परछाई पर परछाई धर कर एक रोज़ ... *तुम्हें खुद में रख कर भूल गयी थी एक रोज़..... अब तुम कल्पना हो गए हो मुझमें ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें