कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 3239

भाषा / Language

जब कभी खुद को ठहर कर देखती हूँ

*जब कभी खुद को ठहर कर देखती हूँ.... तुम्हारी तरफ रफ्ता रफ्ता होती हुई नजर आती हूँ। *मन को उमेठ कर परे रख देती हूँ ये फिर भी आसान है..... ये नैना नहीं मानते द्वार खोल खोल देते हैं *तुम मेरे हिस्से में कभी नहीं आओगे... जानती हूँ मैं जब तक मानूँगी नहीं.... इश्क़ कायम रखूंगी। *वक़्त संभालना कितना मुश्किल है....मन संभालने से भी मुश्किल। *चल मुझे इश्क दिखा... मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें