भाषा / Language
जब कभी खुद को ठहर कर देखती हूँ
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*जब कभी खुद को ठहर कर देखती हूँ....
तुम्हारी तरफ रफ्ता रफ्ता होती हुई नजर आती हूँ।
*मन को उमेठ कर परे रख देती हूँ
ये फिर भी आसान है.....
ये नैना नहीं मानते
द्वार खोल खोल देते हैं
*तुम मेरे हिस्से में कभी नहीं आओगे...
जानती हूँ मैं
जब तक मानूँगी नहीं.... इश्क़ कायम रखूंगी।
*वक़्त संभालना कितना मुश्किल है....मन संभालने से भी मुश्किल।
*चल मुझे इश्क दिखा...
मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें