भाषा / Language
काँच की बोतल में बसे जिन्न की तरह है प्रेम
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काँच की बोतल में बसे जिन्न की तरह है प्रेम
दिखता भी रहे और बाहर भी न आये।
*जब भी ख्वाबों को खंगाला है मैंने
एक फारूख सा प्रेमी और एक दीप्ति सी हँसी मिली।
आसान....
बेहद आसान लोग मेरे ज़ेहन में बसे रहे।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें