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अब किसी को ढूंढने का मन मर गया है। वो सारी जगहें ख़ाली हो गई…

अब किसी को ढूंढने का मन मर गया है। वो सारी जगहें ख़ाली हो गई हैं। एक ही चेहरा था अब वो भी अनगढ़ सा हो रहा। हाथ बढ़ाती हूँ तो उदासी से भर जाते हैं। दस्तक सूख गई और कोई लौटने का नाम नहीं लेता। खो जाने के लिए भूलना एक आसान सीढ़ी है। खंजर से ही निकलती है गोली उम्मीद से तो लहू निकलता है। इस दफ़े सलीके से प्रेम में पड़ूँगी। * अब मलंग शामें ढलती जाती हैं ... ये अलग बात है मैं डूब जाती हूँ।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें