कल्पनाशब्दों के बीच
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तुम में ज़ाया हो कर देखा है

तुम में ज़ाया हो कर देखा है.... हूबहू ज़िन्दगी लगते हो 😊😊😊 नहीं चाहा कि तुम बहुत पास आओ.... बहुत पास एक विराम लगता है मुझे। तुम्हें दूर से खिलते जीते हुए देखती हूँ तो लगता है... तुम्हें कितना तो और देखना बाक़ी है । तुम करीब करीब अजनबी ही पसंद हो। एक निश्चित दूरी में प्रेम और चाहना उतनी ही भर सकती हूँ जितनी बेचैनी और उदासी। हमेशा से जानती हूँ... जिसमें जितना भरा जा सके वो उतना ही भव्य और सतत होता है। बेहद नज़दीकी में कोई कितना भर लेगा अपना मन।पा लेना एक अलग ही किस्म की रिक्तता है। मैं अधभरी ही ठीक हूँ। मुझे दूर और देर जैसे शब्दों में अगाध दिखता है। दोष मन और आंखों दोनों का है। मेरे लिए तुम दूर में सबसे अधिक होते हो। इन बातों को समझने के लिए पास और दूर नहीं चुप्पी और शोर को गले लगाना होगा। एक बार पास आना होगा फिर मुझे बहुत दूर से बरसों जीते हुए देखना होगा। I wish to be grey with u. जिस रोज़ ये कहा था उस रोज मन सगरी दूरियां नाप आया था। जवाब में तुम्हारे कहे दो लफ्ज़ मुझमें tattu हो गए हैं। ठीक मेरे उस तिल पर जो हमेशा से तुम्हारा था। जीवन सुंदर है ।तुम भी । मुझे दोनों ही लभ्य लगते हैं। कहना तो शुक्रिया है पर शुभरात कह रही।💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें