कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 3055

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मैं हमेशा कहती हूँ

मैं हमेशा कहती हूँ.... मैं और मेरे अंदर रुके रहने वाला कलम का शौकीन मन दो अलग अलग लोग हैं। शौकीन मन निर्भीक और बावरा है। कुछ भी देख सुन कह सकता है। मैं उससे उलट बेहद वास्तविक। लिखती हूँ तो खुद को नहीं पहचान पाती । एक तितली दो पंखों से चाँद की ख्वाइशें रखती है । प्रेम के पार जाकर रहेगी क्या किया जा सकता है। कल्पना कल्पना में रहेगी तो उदण्ड ही होगी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें