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रचना 3022

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तुम मुझे मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकते।

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तुम मुझे मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकते। हम दो पूर्ण मन हैं । अगर किसी रोज़ मिल गए तो पूर्णता अदला बदली करेंगे। एक दूसरे में शाश्वत आंकेंगे। निर्मलता को आँखों से झरते हुए देखेंगे। पूछेंगे....इतने दिन अच्छे रहे न? रखेंगे अपने अपने मन पर हाथ और धड़केंगे आर पार। महसूस करेंगे कि जो ज़िन्दगी जी चुके और आगे जिएंगे उसमें उपस्थिति ना भी रहे पर न्यूनता नहीं होगी। हो सकता है मैं कह दूँ कि तुमसे अतिप्रियता में मैं गुज़र गयी हूँ। मुझमें मेरा कुछ भी तो नहीं।ये जो शेष है वो भी चुप्पी से बना है। मैं कितना घट गयी हूँ। हो सकता है तुम मुस्कुरा दो।या फिर गहरी आँखों से आसमान को देखते हुए मेरी चुप्पी लौटा दो। कुछ न कहो और बात यहीं खत्म हो जाए। जहां कुछ न हो वहां संतोष होता है.... मुझे तुमसे वही आशा थी वही मुझे मिलना तय है। मैं ये जानती हूँ। मैं ऐसा देख सकती हूँ.....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें