भाषा / Language
मैं अगर शिक्षिका न होती तो कुछ भी नहीं होती।अभी मुख्याध्याप…
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मैं अगर शिक्षिका न होती तो कुछ भी नहीं होती।अभी मुख्याध्यापिका हूँ पर अभी भी पढ़ाती हूँ....पांचवी क्लास को।
ये इतना बड़ा सुकून है कि जैसे नदी की धारा बदलते हो आप धीरे धीरे रोज़ रोज़ ज़रा ज़रा।
अपार सुख है इसमें...
तस्वीर बस अभी की है।
बच्चों का ptm खत्म करके ली है।कल्पना मैडम ने बहुत ज्ञान दे दिया आज । ये जान कर इतरा रही कि मेरे विद्यालय के अभिभावक मेरी team की मेहनत से संतुष्ट हैं। ऑनलाइन क्लासेज में भी हम उनके बच्चों का पूरा ख्याल रख पा रहे और उनके बच्चे ऐसे कठिन समय में भी आगे बढ़ रहे।मुझे खुशी होती है कि मैं एक अच्छी टीम की लीडर हूँ।
कुछ कमियां अब जो मुझे दिखती हैं कि बच्चे लिखना भूल गए।एग्जाम में गूगल फॉर्म तो भर लेते हैं पर कॉपी का काम पूरा नहीं करते। मौखिक प्रश्नों में प्रवीण हो गए पर डिस्क्रिप्टिव टाइप्स लिखने में आलसी हो रहे। कक्षा पांचवी तक के बच्चे presenting, uploading, googling ,documentation ,googlemeet सब सीख रहे पर कागज़ पर लिखने में पिछड़ रहे।
फ़ोन पर उंगलियां चलने से कलम छूट रही। सुलेख तो भूल ही जाओ।
फ़ोन को क्या पता वो क्या होता है?😊😊
स्क्रीन टाइम बढ़ गया है। बच्चे weight put on कर रहे। खेल कूद नहीं पा रहे। चिड़चिड़े हो गए। फ़ोन एक ड्रग सा बन रहा।😢😢😢
ईश्वर स्कूल खुल जाएं अब तो।
हम मचल रहे इन बच्चों को सहलाने पुचकारने के लिए।😊 हम कब खुल कर जिएंगे?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें