भाषा / Language
तुम्हारा जाना कभी नहीं संजोया पर तुम्हारे आने की हर घड़ी को…
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*तुम्हारा जाना कभी नहीं संजोया पर तुम्हारे आने की हर घड़ी को आँचल में समेट रही।
ये सारे रजनीगंधा उस पल वार दूँगी तुम पर।
तुम मुझे आते हुए ही अच्छे लगते हो।
तुमको याद ख़्याल के दरख़्त पर वैसा ही खिला रखा है।
तुम गए कहाँ हो मुझसे।
*एक रोज़ मैं तुम्हारी आवाज़ बनूंगी....
उस रोज तुम मुझमें से इतने बरस की चुप्पी होले होले से निकाल देना।
ऐसे जैसे कोई ढ़ेर कंटक निकाल रहा हो हृदय से
*किस्से नजदीकियों के हैं ही नहीं हमारे पास ....
एक कविता है दो छोर वाली जो गाहे- बगाहे दूरियां लाँघ लेती है
बेवज़ह हैं ....
बस इसलिए तुम्हारे हैं।
मन की आज़ादी मुबारक😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें