भाषा / Language
चलेंगे
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चलेंगे....
रुक.... चलेंगे
रुक रुक ....चलेंगे
रुक कर ....चलेंगे
रुक - रुक कर ....चलेंगे
कई पुल हैं....
तुम कौन सा लोगे मुझ तक पहुँचने के लिए?
जानते हो?
मैं फ़िर भी नहीं मिलूंगी.....
तुमने कल्पना को चुना है।
*पहला निवाला और आखरी घूँट की तरह बचे रहो..... खुद में । ये वाली दुनिया वैसे भी गोल और चपटी है ...
Love u 😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें