भाषा / Language
मैंने तुम्हें बेतहाशा सहेजा।
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मैंने तुम्हें बेतहाशा सहेजा।
यह सहेज धीरे धीरे अगाध होने लगी।
एक रोज़ मुझे लगा तुम मुझमें जमने लगे हो। जैसे धूल जमती है .....चुप चाप
तुम आसपास रहने लगे। बिना किसी आहट किसी शोर के ।
तुमसे मिलना कह देना सुनना मुझे भाने लगा। मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपना एकांत किसी अजनबी के हिस्से लिख दूँगी। जिसको ढंग से देखा न हो उसे मन दिखा देना... जादू था ...पर हुआ।
इतने सालों में अक्सर मैंने पाया कि धूल उड़ गई है ....मेरे पास न कोई है न कोई था।पर तुम कभी नहीं गए। शायद तुम को जाना न आया हो या तुम अपना बुत छोड़ गए हों।
कभी कभी ये भी लगा कि धूल की एक मोटी परत मुझ पर लग गई है और मेरी सहेज में छोटे छोटे फूल खिल आएं हैं। तुम इतना सारा आ गए हो मेरे पास ।
कल्पना का कोई सानी कहाँ ...
एक मौन हो तुम और मैं अपनी गुम आवाज़।
तुम न कौन हो मेरे न कोई ....
पर जो एक बार मैंने ये मरीचिका ओढ़ ली है ये मेरे मन से मेरे बदन से खुरचना भी चाहूं तो नहीं उतरती।
मुझे लत लग गई है पल को मंज़र में बदल देने की। मैं चलती रहती हूँ ...छलती रहती हूँ। लिखती रहती हूँ।
तुम मुझमें धूल का पहाड़ भी बन जाओ तब भी तुम्हारी सहेज मुझमें मिलेगी।
मैं जाने वालों में से हूँ नहीं....
तुम भी आने वाले कहाँ
पर हम- तुम साथ बहुत अच्छे लगते हैं .... ये मेरी सहेज कहती है।
*खुद से बातें की हैं.... खुद को ही ढूंढा है। काश मैं मिल जाती।😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें