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गमलों में सावन

गमलों में सावन..... Dear Bhavya Pandey आज 18 जुलाई है। भव्या को मेलबोर्न गए हुए आज दो साल हो गए। पिछली फरवरी से उसे देखा नहीं ।करीब डेढ़ साल होने को है। बहुत सारी याद जमा हो गयी है। मन जब बेचैन होता है तो पौधे याद आते हैं। मिट्टी में हाथ सान लो तो लगता है मन गीला हो गया। हरे पत्ते छू लो तो लगता है किसी ने माथे को हल्के से स्पर्श किया। भूरे सूखे पत्ते बीन लो तो लगता कुछ अतिरिक्त भार कम हुआ। कुछ जगह बन गई उजास रखने की। इनको संवार कर खुद नई हो गयी। आज सुबह से इनके साथ थी सुजात खान साहब प्लेलिस्ट में दो घंटे से साथ दे रहे थे। आज कल कविता सेठ जी और उनको ही सुन रही हूँ। किसी को याद करना खुद को खर्च करना है। खूब सारा प्यार तुम्हें। ये सारा हरा तुम तक जरूर पहुंचे। हर नया पत्ता तुम्हारी मुस्कान बने । ज़िन्दगी गुलज़ार रहे मेरी चिड़िया.... अब थक कर चूर हूँ। तुम्हारे शब्दों का इंतज़ार है। माँ💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें