कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2939

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मैं....कौन

मैं....कौन? मैं.... कौन? झुकना और ढांकना का पर्याय हर अंतर से बेपरवाह सही से गलत अच्छे से बुरा बीन इसे विपरीत क्रम की ओर बहा ले जाने वाला प्रवाह मैं....कौन? एक बिना कोने वाला धरती से बड़ा स्पंज का टुकड़ा प्रायः हर दोष हर दोहरी मानसिकता सोखता ग्लानि और धूर्तता को ढोता ...पी जाता। मैं ....कौन? शोर का पारस पत्थर उतने ही सलीके से छूता जितनी कोमलता से लिखता उच्चारण करता सबसे कठिन संवेदनाएं ममता प्रेमिल जैसे अपरिहार्य शब्द गोदता रहता अपनी देह पर । अंदर विषाद का नाद हो या निषाद का निनाद मेरी ग्रंथियां नहीं स्रावित करती थकान और निराशा रोटी में अश्रु का नमक खारा लगता है .….. बच्चे कहते हैं। निवाले में तुम्हारे अंतस का टुकड़ा मीठा लगता है ..... और लाओ घर ताज कहता है मेरी भूख से भर जाता है घर ,पेट मन आँगन और ईश्वर का खाली पात्र फिर भी.... मैं ....कौन? एक हँसती हुई स्त्री
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें