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जुगनू होता फूल

जुगनू होता फूल... मैं तुम्हारी छाती पर रखा एक गाता महकता फूल हूँ.... वो जो तुम्हारी आती जाती साँस से लरज पाता है। ठीक जैसे चांदनी रात में लरजते हैं पहाड़ों पर खड़े चीड़ मुझे कुछ देर अपनी चौड़ी हथेलियों से ढँक लो .... जैसे सफ़ेद धुँध छिपा लेती है पूरा बसा पहाड़ तुम्हारे अलावा मैं दूसरों के लिए खिलना नहीं जानती। मुझे सिर्फ़ तुम देखो ओट से दो हथेलियों के बीच छिपाकर जुगनू होता फूल खिल गया है। *ये पीला धतूरा है। पहाड़ों से लौटते वक्त खिला मिला।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें