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रचना 2937

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मुझे स्वप्न देखने की इजाज़त दो

मुझे स्वप्न देखने की इजाज़त दो.... बर्फ़ ठहरा घना जंगल एक बेहद जीर्ण पवन चक्की उससे कुछ दूर एक झुकी उदास मीनार कुछ पत्ते वाला चिनार हल्की बर्फ़ बारी कुछ बूढ़ी परियों की सी बातें जादुई धुन बजाता जादूगर उदास मीनार से लड़खड़ाती आती घण्टियों की सदाएं हल्के शोर और उजली रोशनी से भरे आकाशीय फव्वारे मुझे हँसने मुस्कुराने और उड़ जाने के लिए लुत्फ़ की किन गलियों से गुजरना चाहिये? क्या मैं अपनी कल्पना के परों में तुम्हारी हाँ की मुहर लगा दूँ? क्या इस स्वप्न में से मैं तुमको ढूंढ ढूंढ कर पूरा कर दूँ? क्या मैं तुम्हें चूम कर इस रोज़ रोज़ की कशमकश को बुत बना दूँ? मुझे इजाज़त दो.... साकार होने की। *दो रोज़ पहले बेचैनी पानी के रंगों में घोल कर पोत दी। पहली बार..... मन रुई सा हो गया।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें