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दर खुला ना भी रखो

दर खुला ना भी रखो... तब भी अर्ज़ियाँ सरकाने की जगह जरूर छोड़ देना.... आना जाना बना रहेगा। फिर ये भी सोचती हूँ.... बरसों की याद का धागा हो तुम.... डोर की उस तरफ़ का तिलिस्म कौन जाने 😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें