कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 2911

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थकान

थकान..... *सुनने का मन बनाओ तो कहूँगी .... मैं थक गई हूं ....बनते बिगड़ते *अक्सर थक जाती हूँ...तुम्हें ढूंढते हुए फिर तुम मिल जाते हो..... किसी और पते पर किसी और के कागज़ पर स्याह जादू बिखेरते हुए। क्या करूँ.... मैं फ़िर भर जाती हूँ उस प्रेम से जो कम पड़ गया इस दफ़े और पिछली दफ़े भी । *मेरी थकान प्रेम में सूखे फूलों सी है। असीम ....अज़ीज़ अथक....अंतिम *मैं थक गई तो कौन पूछेगा.. तुम कैसे हो? मैं कैसे जानूँगी कि बार बार एक ही प्रश्न पूछने से तुम उकता जाते होंगे।कौन मुझे कुछ नहीं कहेगा। मुझे तो आदत है निराश और फिर खुश हो जाने की। अगर तुम्हें मुझे कहना मना है तो मुझे तुम्हारे लिए थकना मना है। *तुम मुझे अब नकार नहीं सकते.... तुम उग आए हो मुझमें ...कंटीली घास की तरह। मुझे ये वाली थकान बनाये रखनी है।मैं खुद से खुद के कांटे ही नहीं चुभन तक निकाल लेती हूँ अब। शुक्रिया इसी बात का रहेगा। *राहत आसान थी पर मैंने उस मन का प्रेम चुना जो मेरे लिए मूक था। राह नहीं .... मुझे राही पसंद था .... मुझ पर सफ़र नहीं थकान महकती है। वही ढो लूँगी। *नहीं होकर भी तुम हो... इस लिए मैं थक नहीं सकती जो है ही नहीं.....वो तो कल्पना में हुआ न तुम तो रहोगे मेरे। कभी सोचना....मैं कितना थक जाती हूँ । 😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें