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प्रेम साँझा उगता है

प्रेम साँझा उगता है उसकी दी उदासियाँ दो पृथक पृथक जगहों पर गिरती हैं। वहीं पनपती हैं। दो प्रेमिल पल पल पीपल होते रहते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें