भाषा / Language
एक रोज़ हम लिखेंगे कि किस क़द्र मरे
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एक रोज़ हम लिखेंगे कि किस क़द्र मरे ....
मरते मरते बचे
बचते बचते जिए
जिए जिए जीते चले गए।
इस सांझे दुःख को हमारे बाद जो कोई पढ़ेगा....
वो ठिठकेगा ,संभलेगा, सुधरेगा और यकीनन सीख लेगा
जीना ....
लड़कर जीना
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें