भाषा / Language
साँझ
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साँझ.....
हर पल हर कहीं से तुम्हें देख सकती हूँ....
मैं खुद अपने मन की आँखें हूँ😊😊😊
मन मनाने से मन ही जाता है।ड़ोर रखी ही ऐसी है कि कभी भी सिरा खोल दूँ ...कभी भी उंगलियों में लपेट कर तुम तक आ जाऊं।
*दीवार घर के पीछे है। खिड़की उसके आगे है।😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें