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रचना 2802

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मैं ख़ाली समय में क्या करती हूँ

मैं ख़ाली समय में क्या करती हूँ...? ये बहुत बेवज़ह सवाल है पर इसके बेमतलब जवाब लिखने की कोशिश करती हूँ। *मैं अक्सर अपनी बखिया उधेड़ती हूँ । *देखती हूँ ...कहाँ कहाँ चाख उभर आये हैं ।कितने गहरे हैं? *किस जगह पर तुरंत अभी पैबंद लगाना होगा । *कौन सी जगह अभी उघड़ी हुई खूबसूरत लगी रह सकती है। *मुझमें अभी बस कुछ टांके लग जाये तो लंबी तुरपन वाली स्थिति को पीछे धकेल सकती हूँ क्या ? उसकी एक फेहरिस्त बनाती रहती हूँ। *फ़र्क़ न पड़ रहा हो तो आस्तीन ऊपर और गले का एक बटन खोल लेती हूँ। जीने और बस जीने के फ़र्क़ को चुन्नट देकर कम करती रहती हूँ। *कितनी देर तक सुई और कैंची मुझ पर चलेगी ? कुछ देर खुद को हाथ से बस यूं समेट कर बैठ जाती हूँ। सलवट पड़ी रहती है ...मैं भरपूर ज़िद्दी रहती हूँ। *कितने चुट पुट बटन चाहिए होंगे कि ज़िन्दगी खुलती बंद होती रहे और बटन टूटने खोने की चिंता से बच जाऊं? मैं इस सवाल से बस एक चुट पुट बटन चुरा लेती हूँ और देर तक हँसती रहती हूँ। *मन अगर ज़्यादा दुख रहा होता है तो उसे पुराने कपड़े की तरह बीच से चीर कर दो कर देती हूँ। एक तुम्हारा एक मेरा .... मैं फिर साबुत हो जाती हूँ। *तकिया अगर सफ़ेद हो और याद भी आये तो प्रेम न लिखकर एक चिड़िया काढ़ देती हूँ ....अपने नाम के पहले अक्षर की। मैं तकिए पर आकाश देखती हूँ। *रेशम में खद्दर ... खद्दर में रेशम मिला मिला कर देखती हूँ कि किसी रोज़ तुम अगर मिल गए तो ख़्वाब का पैरहन क्या होगा और मुझ पर कौन से रंग तुम पहन पहन कर देखोगे? मैं उस पल सफ़ेद हो जाती हूँ। *सौ धागों में से एक पश्मीना चुनती हूँ। मैं खोई रहती हूँ। खुद को काम पर लगाए रखना भी एक शग़ल है। छोड़ो तुम नहीं समझोगे। बातें हैं ..... वो भी बेमतलब . . . बेमतलब 😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें