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रचना 2793

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मेरी ये तलाश मुख़्तसर कर दे

मेरी ये तलाश मुख़्तसर कर दे मिल मुझे आखरी सफ़र कर दे फासले दिखते हैं क्यूँ दरम्यान नाप इसे ,कुछ तो कदर कर दे कुछ पत्थर सा है सीने में दबा हुआ छु इसे ,अपना कुछ असर कर दे फ़ना हूँ , वादा उम्र भर का है रख इसे ,मुझे अब बेफिक्र कर दे इक चुप्पी सी उग आयी है यहाँ बोल इसे ,लफ्ज़ इधर उधर कर दे इक भी सपना न बुनें अब ये आँखें , कह इसे , बाद तेरे अल्लाह शुक्र कर दे *ये ग़ज़ल नहीं है।💐💐💐बस कभी लिखे हुए भाव हैं। तस्वीर भी पुरानी पर मुस्कान ताज़ा है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें