भाषा / Language
कहीं जाना था कहीं जा रही।
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कहीं जाना था कहीं जा रही।
मन को विपरीत दिशा में खेना
बयार पर कोई नाम लिखा बहार किसी और पर आ गयी हो जैसे।
जाने किसकी तरफ़ ले जाते हैं ये कदम
तो आ गए हम
फ़िर मनाएंगे ईश्वर
मिलेंगे मिलेंगे
तब तक आते रहना रोज़ ज़रा ज़रा
बांहें खोले मेरे पहाड़ों से तुम भी मिलो।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें