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रचना 2781

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साँचा बना नहीं था प्रेम का कभी

साँचा बना नहीं था प्रेम का कभी शायद इस लिए अक्षर बने फिर प्रेम का आकार दिखने लगा पंक्तियों में पूर्ण विराम और अर्ध विराम के बीच कलमकार प्रेमी थोड़े ही होते हैं वो तो बस नक्काश होते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें