भाषा / Language
उसे पता है मेरी पहुँच नहीं है उस तक
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उसे पता है मेरी पहुँच नहीं है उस तक
वो हवाओं को पता बता कर रखता है।
वो जानता है इश्क़ फिज़ूल शे है
वो दिल में दो ही पत्ते दबा कर रखता है।
मैं इश्क़ इश्क़ प्यार प्यार करती हूँ
वो मुआ उधर फासला बढ़ा कर रखता है
जानती हूँ अकेले में चोटी खींच लेगा
वो जो आगे से मुँह सूजा कर रखता है।
जी में आए तो हँस कर चूम भी ले
वो मेरी तस्वीर से मस्त बना कर रखता है।
मुझे क़ासिद से भला क्या गिला करना
वो ग़ज़ल में मेरे ख़त दबा कर रखता है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें