कल्पनाशब्दों के बीच
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रोज़ वाले अजनबी

रोज़ वाले अजनबी ..... बस एक शाम ही तो है तुम्हारी ....जो आयी और अब तलक बची है मेरे पास। इशारों में कहना चाहती थी वो शाम और तुम लबों पर शब्द ढूंढ रहे थे । कुछ तो था जो मैं महसूस कर रही थी और ये शाम उसका लेखा जोखा रख रही थी। आसपास सैंकड़ों लोग इसी शाम का हिस्सा थे पर वो उस रोज सिर्फ मेरे हिस्से में आई। उस शाम तुमसे पहली बार मिली। उस एक शाम तुम मेरे पास क्या रहे .....मैं फ़िदा होना सीख गयी। उस शाम ने तुम्हें दोस्त कहा और मैंने .... रूह दुआएँ हमेशा 💐💐💐 तस्वीर साल भर पुरानी आज ही के दिन की है😊 पर मुस्कान उस शाम वाली है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें