भाषा / Language
जंगल की आग है
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जंगल की आग है
गिलास कटोरी चम्मच से नहीं बुझेगी
नल लगाने होंगे
बादलों में
आग समेटनी होगी सूरज की
परमार्थ का चाँद उतारना होगा हथेलियों में
तारों की लड़ी बनानी होगी शीघ्र ...अति शीघ्र
तब जाकर रुकेगा
ये रोग
ये भय
ये शोक
आप सब के प्रयासों को और बल मिले।
ज़िन्दगी को थामे रखिये।
वो छूटने का मन बना बैठी है।
कस कर पकड़े रहिये।💐💐💐
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें